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Showing posts with the label Hindi Diwas

दो टूक

""जैसे गुस्ताखी मैं मैंने उनके मन को छु लिया हो, वो आँखें बंद कर के धीरे से बोली "हम्म्म तुम भी!"" "ऐ सा शायराना  मैं कभी नहीं था, हाँ लिखता था बस यूँ हि… कभी किसी कापी के पीछे के पन्नो में या कोई मेल-बॉक्स में ड्राफ्ट बना के छोड़ दिया बस। किसी को कभी सुनाया नहीं, वैसे भी दोस्त अक्सर मेरा मजाक बनाये रहते हैं ऐसे ऊल जलूल अध गुथे शब्द देखेंगे तो टांग खिचाई दरार पैदा कर देगी। और वैसे भी जब से फेसबुक आया है हर कोई लिखता ही रहता है। कई बड़े लाजवाब लिखते है, उनके आगे तो मैं जग हसाई ही समेट पाउँगा बस। और फिर दुनिया को अब और साहित्य की जरुरत नहीं है, खास तौर से प्रेम विषय पर। प्रेम पर लिखे साहित्यों ने गजब ढा दिया है,  जाने कैसे लिखतें होंगे वो अल्फ़ाज़-ए -हुनर... मानो सुबह की ओस को गजरे में पिरो कर प्रियसी के केशों में लपेट दिया हो। कुछ ऐसे की सुंदरता की उस कसौटी को कभी न छु पाने की टीस भी मेरे अंदर के कवि को दुलत्ती मार दे। क्या पता ये रुबाई, ये गजल.… शायद प्रेम बस साहित्य में ही मिलता है वरना देखा तो...

अवतार

"पता भी कैसे हो भला आखिर सत्ता के लालच की गाथा का सौर्य गान भर गया जा सकता है न धर्म का क्या गायन होगा? टी आर पि जैसी कोई चीज तो तब भी थी न?" सो ने की लंका जली ये तो सब जानते है, रोज जलती है... नया क्या है? लेकिन राम राज आया था इसके प्रमाण कहीं नहीं मिलते| गजब है विभीषण को लंका मिल गयी, सुग्रीव को किष्किन्धा और हनुमान को? अरे भाई सारे उतापे माफ़ जाओ ऐश करो... सीता मिली कसम खाई, तजि गयीं, फिर मिली लक्ष्मण रेखा में कैद हुईं फिर तजि फिर गयीं, फिर मिलीं मिली अग्नि परीक्षा हुई और फिर तजि गयीं और उत्तराधिकारी की लालच में फिर अश्वमेघ हुए! मगर कब तक... अरे भई, कुल देवी, सावित्री, लक्ष्मी बना तो दिया, नारी होकर अब क्या किरदार भला? भोग विलास के पाश में इन्द्र्पस्त जुवे में हार कर! अपने गुरुओं, परिजनों, पितामहों को छल कपट से मार कर! पांडव जीत गए महाभारत! फिर? वेदव्यास की स्याही खत्म! पता नहीं... कोई प्रमाण नहीं की धर्म स्थापित हुआ भी था की नहीं! पता भी कैसे हो भला आखिर सत्ता के लालच की गाथा का सौर्य गान भर गया जा सकता है न धर्म का क्या गायन होगा? टी आर पि जैसी कोई चीज तो तब भी...

मैं हिंदी सी सो जाऊँगी

मैं ऐंठन सी बलखाई सी,  कुछ लरज लरज शरमाई सी। एक रोज बिदा हो जाऊँगी,  मैं हिंदी सी सो जाऊँगी॥ मैं लदी भूत-प्रेत की मिथ्या से,  कायरता की कविता से, पाखंडो की बरबर्ता से, मैं कल क्रूर विरा बन जाऊँगी॥   मैं हिंदी सी सो जाऊँगी।  मैं ज्ञान सरोवर बिसर गयी,  अंधकार ह्राष सी पसर गयी,  कल खोजोगे मैं किधर गयी,   मैं न रज ऋचा बिना रह पाऊँगी॥   मैं हिंदी सी सो जाऊँगी।  चिर नवीन ये शालायें, बाल तरुण की आशाएँ, विज्ञान गणित की वल्गाएँ, परहित कर में धर जाउंगी॥   मै हिंदी सी सो जाऊँगी।  जब झूठे ढोल बजाओगे, मिटटी के पुतले लाओगे,  जग प्रत्यक्ष रास रचाओगे,  मैं सब नयन अधर भर जाउंगी||   मै हिंदी सी सो जाऊँगी।                                                    :-जीतेन...