जलती निगाहें, मचलते ख्वाब प्यार की तर्ज़, नफरत की आग, नर्म मासूमियत में ये मेरा फ़न था, जो कुछ भी लिखा, मेरा बचपन था! फिर परिंदे को पर मिले, गुलशन में कांटे खिले, धूमिल तस्वीर सी बनी जिंदगानी, मेरे ख्याल से थी जो लापरवाह जवानी! अब पंख मेरे थक चुके है, रेले आंसुओं के रुक चुके है! मायूस.... अपनी परछाई ढूँढता रहा, तभी चुपके से बड़प्पन आ गया! लोग मशवरे में मसरूफ रखते थे, और हम पहले से जरा झुक कर चलते थे! मर गया जोश, जलापा आ गया, सब चिराग बुझ गए, बुढ़ापा आ गया!! एक रोज उड़ती पतंग दिखी, झपकती आँखे जरा तंग लगी, कलरव पंछियों की बुझ गयी, और डोर साँसों की टूट गयी....!! मेरी ये स्याही अब अग्नि को समर्पित, दो पुष्प तुम भी ले आना, करना मुझ पर अर्पित!!!! करना मुझ पर अर्पित!!! ...
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