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गाली का दर्शन

"विश्व समुदाय के लिए कितना मुश्किल हो जाता है जब वो नेताओं के बारे में कुछ कहना चाहते हों और इस बहुमूल्य शब्दावली से वो महरूम रह जाएँ ! शुक्र है हम इस भाषा से लबरेज़ हैं !" हु नर तो ऐसा है कि बग्घी हांकते वक्त उपयोग कि गयी शब्दावली से आप किस शहर में हैं ये जान सकतें हैं। और आदत ऐसी कि इस शहर का घोडा उस शहर की बग्घी न खींचेगा जब तक लगाम को ऐंठते हुए टाँगे वाला वहीँ की दो चार न बक दे। चने, घास और लगाम से ज्यादा अपनापन गालियों के स्वाद में होता है। गालियों को व्यर्थ ही बदनाम किया जाता है, ये तो परंपरा के धरोहर के अनुरूप लिख के रखनी चाहिए! इनके उपयोग की श्रेष्ठतम तरीके जानना हो तो किसी भी नुक्कड़ के चौधरियों के साथ दो चार चाय की चुस्की ले लीजिये। इन चौधरियों से अगर तेंदुलकर, आमिर या ओबामा जैसों की सीधी मुलाकात हो जाये तो इन सब को अपनी गलतियां  में पता चल जाए। अगर इनको वाकई अपनी कार्य दक्छाता फिक्र है तो उन्हें एक बार गलियों के  सूरमाओं से मिलना चाहिए। वो भी पूरे जमनी लहजे में, तभी मूल्यांकन की द्...